फिर एक बार राष्ट्र की आवाज को स्वार्थ की आवाज ने खोच दिया, दिनाक २६/१२/२०११ को राजी समझ लोकसभा (जो की लोकतंत्र का आइना हैं ) में लोकपाल बिल पर बहस हुई और स्वार्थ की आवाज ने राष्ट्र की आवाज को नकार दिया, यानि जो लोग खुली जुबान से लोकपाल की वकालत या सिफारिश कर रहे थे उन लोगो ने भी अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर या विरोध दिखाकर लोकपाल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में विरोध जताया!
एक शर्मनाक और बेशर्मी की हवा की दुर्गन्ध ने सारे राष्ट्र के दम को घोट दिया, लेकिन वे लोग यह नही जानते की राष्ट्र ऐसे मरता नही हैं बल्कि राष्ट्र की अवाज कुछ चुने हुए सांसद नहीं हैं बल्कि जनता की आवाज हैं ,मैंने पहले तो अपने साथियों से कभी नहीं कहा लेकिन आज जरुर कहना चाहता हू की भ्रष्टाचार और बेईमानी के खिलाफ इस संधर्भ को जन - आन्दोलन से तब्दील कर के राष्ट्र को भष्टाचार से मुक्त करने का साहस कर दिखाए यही वक़्त की जरुरत हैं. !!!!
