Thursday, June 9, 2011

हमारा नेतिक पतन

आज जबकि दुनियाभर में एक अजीब रफ़्तार का युग हैं सब एक दुसरे से आगे निकलने की चेष्टा में भागे जा रहे हैं, आगे बढने की चाह में बहुत कुछ पीछे छुट गया हैं पीछे छुट गई  हमारी अद्यात्मिक शांति ,एक दुसरे के प्रति हम दर्दी ,हमारा सुख और चैन , अराजकता सी हैं आगे बढने की दौड़ में शामिल होंना कोई बुरी बात नहीं हैं,लेकिन जिन्दगी की कीमत पर नहीं नेतिकता की कीमत पर नहीं , अगर हम चंद सिक्को के लिए जिन्दगी जीने का अर्थ ही भूल गए तो एक अन्धकार में खो जाने का डर हमेशा बना रहेगा,

बात और बहस आज के संधर्भ में शिक्षा की होनी चाहिए ,रोजगार की होनी चाहिए ओर  किस तरह हम देश के करोड़ो नोजवान को सही दिशा डे सकते हैं, लेकिन हम दिन बा  दिन एक गुमराही अंधरे की तरफ चलते जा रहे हैं , जिससे खबरदार रहना हैं!

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