रक्षाबंधन के दिन जब मैं घर से निकला चलते चलते ठिठक कर एक मौड़ पर रुका, एक युवती ने मुझे आवाज दी दीन सी, हीन सी, फीकी मुस्कान के साथ मुझसे कह रही थी, मैं भी तुम्हारी बहन हु, देखो मेरी आँखों मैं भी सपने हैं, कही सीमा पर या सीमा पार गए जो भी मेरे अपने हैं , वक़्त की बेहरमी से लडते लडते में थक गई हु, नहीं तो मैं कोई बीता वक़्त नहीं, मैंने गौर से देखा उसके चेहरे की तरफ गरीबी और आभाव की निशानी उसके चेहरे पे थी! बेवजह अपमान सहने की कहानी उसके चेहरे पे थी. मैंने कहाँ में तो तुम्हारा कोई नहीं कैसे जानती हो मुझे , उसने कहाँ, मेरा तुम्हारा भाई बहन का रिश्ता हैं, मुझे देखकर भी, छोड़कर भागे जा रहे हो, में इसलिए राखी लेकर खड़ी हु, शायद तुम आभाव, गरीबी, भय, और आतंक से युद्ध करने जा रही हो. !!!!

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