वैसे इसे हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा , की हम इंसानों में नहीं जातियों और धर्मो में पैदा होती हैं, और मरते हैं, यह नियम प्रकर्ति विरुद्ध हैं, लेकिन हमारे समाज- शाश्त्रियो ने धरम के ठेकेदारों ने या घिनोनी राजनीती करने वाले राज-नेताओ ने समाज के इस गढ़दे में धकेला हुआ हैं जिससे हम पर्यास के बावजूद भी निकल नही पा रहे ऊपर से आरक्षण जैसी फिल्मे आग में घी का काम कर रही हैं,इसमें कोई दो राय नहीं हैं की कमजोर को, गरीब को, पिछडो को, दलितों को आगे आने का अवसर मिलना चाहिए, ना की उनको धिक्कारना चाहिए न धमकाना चाहिए के वो दीन हीन हैं ही और धमकाओगे तो बेचारे की हिम्मत व् विश्वाश टूटेगा इसलिए फिल्मों से सन्देश और नसीहत मिले जो गरीब के लिए उत्साहवर्धक हो, स्वस्थ हो और समस्या को हल करने वाली हो रास्ता बताने वाली हो,
चरित्र हमेशा शीर्ष से मिलता हैं किसी बच्चे ने आज तक अपने बाप का चरित्र नहीं दिया , इसलिए शिक्षित लोगो के, बडे लोगो के तथाकथित बड़ी जातियों के अपने चारित्रिक बदलाव लाना चाहिए और गरीब, दीन हीन को गले से लगाना चाहिए!!
""छोड़कर अपने स्वार्थ की बातें उन्हें भी गले से लगालो तो कोई बात बने !!
धमकाने और सताने से कुछ नहीं मिलता उनके साथ मिलके मुस्कुराओ तो कोई बात बने !!

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