Monday, August 8, 2011

समीक्षा लोकतंत्र की

अन्ना हजारे ने अपने बूते दिल्ली में लोकतंत्र की समीक्षा कर ही डाली बढती उम्र के अनुभवी कदमो ने फिर एक बार चांदनी चौक के आम आदमी के मन को नाप डाला तो पता चला की जनता का  मन और मत कपिल सिबल के साथ नहीं बल्कि एक भष्ट्राचार के विरुद्ध उठी आवाज के साथ हैं , मंथन हुआ बेशक यह मंथन सुर और असुरो की वक़्त का न सही यह मंथन हैं आजाद भारत के लोकतंत्र का जहाँ का आम आदमी चाहता हैं की कानून सबके साथ एक जैसा हो चाहे कोई रजा हो या रंक हो अंधे कानून की लाठी की चोट पूंजीपति और गरीब, नौकरीपेशा और अधिकारी, नायाधिश और पटवारी सबकी सिर पर एक जैसी होनी चाहिए!!!!

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