यह खेल हैं इस देश के मिडिया के आये दिन काका हाथरसी की हास्य कविता याद आती हैं, नाम मिला और तो काम मिला कुछ और यानि वाह रे इस देश के मिडिया और टी. वी चैनल तुझे गरीब गावं और बेरोजगार से तथा देश के बिखरते ,परेशान हालत नौजवान से जैसे कोई सारोकार नहीं बस चैनल की टी.र.पी कैसे उन्नत हो चाहे इसके लिए किसी भी आदर्श की कुर्बानी देनी पड़े दी जा सकती हैं, सारा आलम घबरा उठा इस बेशरम दर्द से किसी में झूठे और फर्जी चेंनेलो का सामना करने की हिम्मत नहीं, जो सरकार जायदा पैसा दे वो चैनल उसी का हो जाता हैं!
